कचरे के ग्लूकोज की बोतल से ड्रिप सिस्टम वाली खेती कर काफ़ी कम समय में ही लाखों कमा रहा है यह किसान

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हमारे देश के लोगों का मुख्य आय का स्रोत कृषि है। जिस क्षेत्र में जलवायु और भौगोलिक स्थिति इसके अनुकूल होती है वहाँ किसानों को अपने मेहनत का फल काफ़ी संतोषजनक मिलता है परंतु कुछ किसान खराब जलवायु और भौगोलिक स्थिति में खेती करने को मजबूर है। जहाँ इनके मेहनत का फल काफ़ी असंतोषजनक रहता है। वहाँ के किसानों को भारी नुक़सान का सामना करना पड़ता है, तो वहीं एक दो अपवाद भी मिल जाते हैं जो विकट परिस्थितियों में भी अपने दृढ़ संकल्प और कठिन परिश्रम से काफ़ी अच्छी कमाई कर रहे होते हैं।

आज की हमारी कहानी ऐसे ही एक शख़्स की है जिसने आदिवासी पहाड़ी क्षेत्र में भी अपने से विकसित तकनीक की सहायता से काफ़ी अच्छी कमाई कर रहा है।

मध्यप्रदेश के झाबुआ क्षेत्र के रमेश बारिया (Ramesh Baria) के खेती की शुरुआती चुनौतियों के बीच हुई क्योंकि यह एक पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र है जहाँ ना तो मिट्टी की सही सतह होती है और ना ही सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध होता है। इस कारण लागत के मुकाबले आय कम होता है।

रमेश बारिया इससे काफ़ी निराश थें जिसके लिए NAIP (National Agriculture Innovation Project) के तहत किसान विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क कर उनसे गाइडेंस लेकर सर्दी और बरसात में एक छोटे से पैच में सब्जी की खेती शुरू की जो इस ज़मीन के हिसाब से बेहद कारगर से हुई और यहाँ करेला, स्पांजी लौकी जैसी फसलें काफ़ी अच्छी तरह उगने लगी।

सिंचाई की पानी की कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने NAIPM के ही सुझाव पर वेस्ट ग्लूलोज़ की बोतल के मदद से एक नया तरीक़ा ढूँढ निकाला। उन्होंने इसके लिए ₹20 प्रति किलो के हिसाब से वेस्ट प्लास्टिक की बोतल खरीद बोतल के ऊपरी भाग को काटकर उन्हें पौधों के पास लटका दिया इन बोतलों से बूंद-बूंद के हिसाब से पानी का प्रवाह किया और फिर अपने बच्चों को स्कूल जाने से पहले इसमें पानी भरने को बोला। यह तकनीक बेहद कारगर साबित हुई और सीजन की समाप्ति पर उन्होंने 0.1 हेक्टेयर की ज़मीन से लगभग ₹15, 200 का लाभ प्राप्त किया।

इस प्रकार उन्होंने ना सिर्फ़ पौधों की देखभाल का तरीक़ा ढूँढा पानी भी बचाया। उनके खेती के इस तरीके के लिए उन्हें मध्य प्रदेश के ज़िला प्रशासन और सरकार कृषि मंत्री के तरफ़ से सराहना के सर्टिफिकेट से भी सम्मानित किया जा चुका है।

रमेश के इस तरीके को वहाँ के दूसरे किसान भी काफ़ी तेजी से अपना रहे हैं। उन्होंने कचरे की मदद से खेती का अनोखा तरीक़ा ढूँढ निकाला है जो निश्चय ही उनकी सूझ-बूझ का परिणाम है।