विकलांगता के कारण पिता ने भी छोड़ा साथ, मुश्किल हालतों में पढाई कर पहले ही प्रयास में उम्मूल बनी IAS

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विकलांगता, गरीबी, लाचारी, मजबूरी ये सब कुछ भी आपके आड़े नहीं आता जब आपके अंदर जुनून हो, हिम्मत हो और कठिन परिश्रम करने की ताकत हो। परिस्थिति चाहे जैसी भी हो आपको कुछ ना कुछ अनुभव मिल ही जाता है। बहुत ही कम उम्र में दिल्ली की दिव्यांग बच्ची ‘उम्मुल खेर’ (Ummul Kher) को भी यह अनुभव हो गया कि बिना शिक्षा के वह ख़ुद की या अपने परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदल सकती। आगे चलकर वह अपने पहले ही प्रयास में अपने परिवार के आर्थिक सहयोग के बिना, अपने मेहनत के दम पर एक आईएएस अधिकारी बन गई।

बीमारी के कारण 15 से अधिक बार इनकी हड्डियाँ फैक्चर हुई

राजस्थान (Rajasthan) के पाली मारवाड़ की रहने वाली उम्मुल खेर कोई साधारण लड़की नहीं थी। उन्हें तमाम तरह की परेशानियाँ थी। बचपन से ही दिव्यांग होने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक, शारीरिक और पारिवारिक समस्याएँ भी थी। उन्हें अजैले बोन डिसऑर्डर नाम की एक ऐसी शारीरिक बीमारी है जो हड्डियों को बहुत कमजोर करती हैं और उसे मज़बूत नहीं होने देती।

ias Ummul Kher

इस बीमारी के कारण उन्हें शारीरिक रूप से बहुत परेशानी होती है। ये बीमारी शरीर की हड्डियों को इतना कमजोर बना देती है कि गिरने पर तुरंत ही फैक्चर हो जाता है। सिर्फ 18 साल की छोटी उम्र में ही उम्मूल की हड्डियाँ लगभग 15 से अधिक बार फैक्चर हो चुकी है।

फुटपाथ पर मूंगफली बेचा करते थे पिता

उम्मुल के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी नाज़ुक थी कि वह उम्मूल का इलाज़ तक नहीं करा सकती थी और ना ही उन्हें उचित शिक्षा दे सकती थी। उम्मुल के पिता फूटपाथ पर मूंगफली बेचने का काम करते थे और उसी से वह अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। दिल्ली में निजामुद्दीन के पास एक झोपड़ी में उम्मूल का पूरा परिवार रहता था। उस झोपड़ी में पूरे परिवार का रहना काफ़ी मुश्किल था। बरसात आने पर पूरे झोपड़ी में पानी टपकता था। उनकी मुश्किल है तब और बढ़ गई जब 2001 में उनकी एकमात्र झोपड़ी भी टूट गई।

तब उनका पूरा परिवार त्रिलोकपुरी की तरफ़ रहने चला गया। तभी उम्मूल को यह एहसास हुआ कि बिना शिक्षा के वह इस ज़िन्दगी को कभी नहीं बदल सकती हैं और उनके परिवार की स्थिति ऐसी थी कि उनका हर रोज़ का खाना पीना तक दूभर था तो पढ़ाई तो बहुत दूर की बात है।

मां भी हमेशा के लिए अलविदा कह गई

वह कहते हैं ना कि जब भगवान देते हैं तो छप्पर फाड़ कर देते हैं। इसी तरह इनकी मुश्किलें भी एक पर एक बढ़ती जा रही थी। इन्हीं मुश्किलों के बीच एक ऐसा झटका और लगा जिससे उबर पाना बहुत मुश्किल हो गया, जब उम्मूल की माँ हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गई। एक उनकी माँ ही थीं जो उम्मूल को हर काम में बहुत सहयोग किया करती थी।

मां के देहांत के बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। दूसरी शादी के बाद घर का माहौल इतना गंदा हो गया कि उम्मूल वहाँ रह भी नहीं सकी और आखिरकार उन्होंने अपना घर छोड़ने का फ़ैसला कर लिया।

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ट्यूशन से 100-200 रुपए कमा लेती थी

घर छोड़ने के बाद उम्मूल एक छोटे से किराए के रूम में रहने लगी और वहाँ कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया जिससे इन्हें 100-200 रुपए मिल जाते थे। इतने विषम हालातों के बावजूद भी उन्होंने ठान लिया कि आगे चलकर यह एक आईएएस अधिकारी ही बनेगी।

स्कॉलरशिप से आगे की पढ़ाई पूरी की

शुरू से ही पढ़ाई में काफ़ी तेज रही उम्मूल अपनी पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई आईटीओ में निर्मित एक विकलांग स्कूल से की। उसके बाद 8वीं तक की पढ़ाई कड़कड़डूमा (Karkardooma) के अमर ज्योति चैरिटेबल ट्रस्ट (Amar Jyoti Charitable trust) से पूरी की। उम्मूल को आठवीं कक्षा में बहुत अच्छे अंक प्राप्त होने के कारण इन्हें स्कॉलरशिप दिया गया।

इसी स्कॉलरशिप से यह अपनी आगे की पढ़ाई एक प्राइवेट स्कूल से कर पाई। उसके बाद इन्होंने अपने दसवीं की परीक्षा में 91% और 12वीं में 90% अंक प्राप्त किए। 12वीं करने के बाद दिल्ली से ही इन्होंने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया और साथ ही साथ अपना ख़र्च चलाने के लिए यह बच्चों को ट्यूशन दिया करती थी।

पहले ही प्रयास में UPSC में हुई सफल

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ग्रेजुएशन के बाद 2016 में उम्मूल पहली बार यूपीएससी की परीक्षा दी और अपने कठिन परिश्रम के द्वारा पहले ही प्रयास में यूपीएससी परीक्षा में 420वी रैंक प्राप्त की। इसमें किसी भी तरह से इनके परिवार ने सहयोग नहीं किया था। लेकिन फिर भी इन्हें अब अपने परिवार से कोई शिकायत नहीं है।

उम्मूल ने अपनी पढ़ाई के लिए अपनी कमजोरी को ही अपना ताकत बना लिया। जिन-जिन हालातों से उम्मूल गुजरी हैं उन हालातों से शायद ही कोई बच्चा उबर पाए। इन्होंने सच में समाज में एक ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसे हर कोई प्रेरणा ले रहा है।