कितने मेगापिक्सल की होती है आपकी आंख ? जानिए इस की कार्यप्रणाली

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हमारी पृथ्वी अन्य ग्रहो से बिलकुल अलग है और खास भी कारण धरती पर जीवन का होना। वैसे तो पृथ्वी पर असंख्य जीव है परंतु जब बात प्रतिभाशाली परिष्कृत जीव की होगी सर्वप्रथम स्थान “मानव”।

मनुष्य धरती पर सबसे प्रतिभाशाली जीव है क्योंकि मनुष्य देखने,सोचने,समझने और कार्य करने में पूर्णतः सक्षम है। मनुष्य को प्रतिभाशाली बनाने में सबसे ज्यादा योगदान मस्तिष्क और आँखों का है। हमलोग एक त्रिआयामी संसार(Three dimensional world)में रहते है हालांकि चौथा आयाम(Dimension)समय है पर समय के बारे में हमारी जानकारी अभी अपूर्ण है। हमारी आँखे सभी चीजों को त्रिआयामी छवि(Three dimensional image)के रूप में देखती है। मानव नेत्र एक प्रकाशीय यंत्र है जो फोटोग्राफिक कैमरे की तरह की व्यवहार करती है। हमसब जानते है जब प्रकाश किसी वस्तु से टकराकर हमारी दृष्टिपटल(Retina)पर पड़ता है तो उस वस्तु का प्रतिबिंब रेटिना पर बनता है रेटिना नेत्र का प्रकाश सुग्राही भाग(light sensitive part)है। दृक तांत्रिक(optic nerve)यह रेटिना पर बनने वाले प्रतिविंब को संवेदनाओ द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करती है।मानव आंख किसी कैमरा की तरह ही काम करती है और कैमरा में तीन मुख्य भाग होते हैं.

1. लेंस या प्रकाशीय यन्त्र जो प्रकाश को एकत्रित कर तस्वीर बनाता है.
2. सेंसर जो छवि के प्रकाशीय ऊर्जा को इलेक्ट्रिक सिग्नल्स में बदलता है.
3 प्रोसेसर जो उन इलेक्ट्रिक सिग्नल्स को वापस स्क्रीन पर इमेज में बदल कर दिखाता है.

लेकिन हमारी आंखें एक परिपूर्ण कैमरा नहीं है यह केवल कैमरा का पहला भाग हैं. आंखें केवल सामने से आने वाले प्रकाश को ग्रहण कर एक तस्वीर बनाने की क्षमता रखती है. इस बनाई गई तस्वीर को समझने का काम मस्तिष्क का एक खास हिस्सा करता है जो कि वास्तव में सेसंर और प्रोसेसर दोनों का काम करता है. उदाहरण के तौर पर –

आपके पास स्मार्ट फोन में जो कैमरा होता है उसकी क्षमता कितनी है? 5,8,13 या 20 मेगापिक्सल. पर क्या आपको ये पता है कि आपके स्मार्ट फोन कैमरे का सेंसर किस आकार का है?अधिकतर स्मार्ट फोन के सेंसर 1/3.2 इंच के आकार का होता है और यही कैमरे का वो भाग है जिस पर ली गई तस्वीर की गुणवत्ता निर्भर करती है.

इसी लिए स्मार्टफोन कैमरा किसी एसएलआर कैमरे का मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि समान मेगापिक्सेल होने के बावजूद भी डीएसएलआर कैमरे में सेंसर का आकार काफी बड़ा होता है. इसीलिए एक 8-10 मेगापिक्सल का फुल फ्रेम डीएसएलआर कैमरा किसी 40 मेगापिक्सल के स्मार्ट फोन कैमरे से अच्छी तस्वीर बना सकता है.

इसी प्रकार से आंख जो प्रकाश ग्रहण करके छवि निर्माण करती है उस छवि की प्रोसेसिंग करने के लिए इसी तरह के सेंसर की जरूरत होती है और मानव शरीर में यह सेंसर आंख में ना होकर मस्तिष्क में होता है. जहां तक आंखों से प्राप्त प्रकाशीय सिग्नल्स तंत्रिका तंत्र के द्वारा संचालित खास प्रकाशीय तंत्रिकाओं के द्वारा पहुंचाया जाता है. इसके मस्तिष्क ही इस जानकारी को समझकर एक छवि का निर्माण करता है.

फोटोग्राफी का सीधा सा अर्थ है ‘रोशनी को पढ़ना’ और पढ़ कर क़ैद करना. अलग अलग रोशनी के हिसाब से हमारी आंख खुद को सेट कर लेती है और रोशनी को पढ़कर उसे हमारे दिमाग तक पहुंचाती है. हराम दिमाग फिर उस रोशनी से बनी हुई तस्वीर को देखता है. दुनिया में अकेली मशीन जो आंख का काम करती है वह है कैमरा.आंख जैसे काम करती है कैमरा ठीक उसका मशीनी रूपांतरण है.रोशनी सबसे पहले कॉर्निया को छूती है फिर प्यूपिल से होकर गुज़रती है. आंख के लेंस तक पहुंचने से पहले ही कॉर्निया रोशनी को 70 % मोड़ देता है.

आपके कैमरा का फ्रंट लेंस बिलकुल ऐसे ही काम करता है. कॉर्निया के पीछे का आईरिस रंग और अपर्चर वैसे तय करता है जैसे कैमरे का डायफ्राम आपके बनाए गए फ्रेम का अपर्चर तय करता है. आंख और कैमरा दोनों के लेंस रोशनी को फोकल पॉइंट तक मोड़ते हैं लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे से बेहद अलग हैं आंख का लेंस फोकस खुद चेंज कर लेता है जबकि कैमरे में लेंस को फिल्म से दूर या पास करके फोकस करना पड़ता है.
रेटिना बिलकुल कैमरे की फिल्म जैसा होता है. रेटीना की फोटो रिसेप्टर कोशिका हमारे दिमाग को तस्वीर दिखाती है जिससे हम सब कुछ देख पाते हैं. आंख कैमरे से बहुत ज़्यादा नाज़ुक है लेकिन दोनों का काम एक ही है. रंग और रोशनी की मदद से एक तस्वीर हमारे दिमाग तक पहुंचाना.

आंख एक बार में 576 मेगापिक्सल का क्षेत्रफल देख लेती है लेकिन हमारा मस्तिष्क इसे एक साथ प्रोसेस नहीं कर पाता वह केवल थोड़े से ही हिस्से को ही हाई डेफिनेशन में प्रोसेस कर पाता है. इसीलिए किसी भी घटना को सही तरीके से देखने के लिए हमें अपनी आंखों को उस ओर घुमाना पड़ता है.
आंख जो तस्वीर आपको दिखती है उसका मेगापिक्सल होता है 576
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