वो मुख्यमंत्री जो मंत्रियों पर मार डालने का लगाते थे आरोप, कभी लालू-नीतीश के थे गुरू

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बिहार की राजनीति में कपूरी ठाकुर का नाम एक टर्निंग प्वाइंट के तौर पर देखा जाता है। कपूरी ठाकुर दो बार बतौर सीएम बिहार पद में पदभार संभाल चुके हैं। कपूरी ठाकुर का जन्म गांव समस्तीपुर जिले में हुआ था। कपूर ठाकुर बिहार के सामाजिक आंदोलनों का प्रतीक रह चुके हैं। इसलिए हर तरह के लोग और विभिन्न दल उन्हें हर राजनीतिक पड़ाव पर जरूर याद करते हैं। कपूरी ठाकुर को एक राजनीतिक योद्धा के तौर पर भी देखा जाता है, जिसने कई बार अपमान का घूंट पीकर भी बिहार में बदलाव की तस्वीर बनाई थी।

आज हम कपूरी ठाकुर के जिंदगी के कई उतार-चढ़ाव के बारे में आपको बताएंगे। साथ ही कपूरी ठाकुर और राजनीति के कई ऐसे किस्से सुनाएंगे जिन्हें आपने पहले कभी शायद ही सुना होगा।

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जब लालू ने किया कपूरी ठाकुर का जिक्र

दरअसल ये बात साल 1990 की है। बिहार में खगड़िया जिले में पढ़ने वाले अलौली में लालू प्रसाद यादव का एक कार्यक्रम चल रहा था। इस दौरान उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कपूरी ठाकुर का जिक्र किया। लालू यादव ने कहा जब कपूरी जी आरक्षण की बात करते थे तो लोग उन्हें मां, बहन-बेटी की गाली देते थे और जब मैं रिजर्वेशन की बात करता हूं तो लोग गाली देने से पहले अगल-बगल देख लेते हैं की कहीं कोई पिछड़ा दलित आदिवासी सुन तो नहीं रहा।

दोनों पक्षों में यह बदलाव कपूरी ठाकुर जी की ही देन है। उन्होंने इसका पूरा श्रेय उस ताकत को दिया जो कपूरी ठाकुर के हास्य पर रहे समुदायों को दी गई थी। पिछड़ा जाति वर्ग के लोगों को पद हासिल हुए तो उनका सम्मान भी होने लगा। यही कारण था कि आज लोग ताने देने से पहले अगल-बगल देख लेते थे।

बिहार की राजनीति में कपूरी ठाकुर गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनने वाले पहले नेता थे। आगे जाकर उन्हें बिहार की राजनीति में जननायक की उपाधि भी मिली। उनका नाम उन महान समाजवादी नेताओं के तौर पर गिने जाने लगा, जिन्होंने निजी और सार्वजनिक जीवन दोनों में आचरण में ऊंचे मापदंड स्थापित किए और लोगों के सामने अपने फैसलों और कर्मों से अपनी छवि बनाई।

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जब मांगना पड़ा कोट

गौरतलब है कि साल 1952 में कपूरी ठाकुर पहली बार विधायक बने थे। उन्हीं दिनों में उनका ऑस्ट्रेलिया जाने वाले एक प्रतिनिधि मंडल में चयन हुआ था। इन दौरान उनके पास कोर्ट नहीं था, तो एक दोस्त से कोट मांगना पड़ा। कोट तो मिल गया लेकिन फटा हुआ था। खैर कपूरी ठाकुर उसी फटे हुए कोर्ट को पहनकर ऑस्ट्रेलिया चले गए। इसके बाद युगोस्लाविया के मुखिया मार्शल टीटो ने देखा कि कपूरी ठाकुर का कोर्ट फटा हुआ है। इसके बाद मार्शल ने उन्हें नया कोट गिफ्ट किया।

प्रधान सचिव थे यशवंत सिन्हा

कपूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उनके प्रधान सचिव थे यशवंत सिन्हा। ऐसे में आगे जाकर यशवंत वाजपेई सरकार के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी बने। यह किस्सा उस दौरान का है जब एक वक्त में दोनों अकेले बैठे हुए थे तो कपूरी ठाकुर ने यशवंत सिन्हा से कहा आर्थिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ जाना या फिर सरकारी नौकरी मिल जाने से सम्मान नहीं बढ़ता। आपको क्या लगता है इससे समाज में सम्मान मिल जाता है, तो ऐसा नहीं होता। वंचित वर्ग के लोग को सम्मान प्राप्त हो जाए ये इतना आसान नहीं होता।

इसके आगे उन्होंने अपना एक उदाहरण भी दिया। दरअसल यह उदाहरण उनकी आपबीती पर आधारित था। जब वह मैट्रिक फर्स्ट डिवीजन से पास हुए थे। नाई का काम करने वाले का बेटा फर्स्ट डिवीजन से मैट्रिक पास हुआ था। उन्होंने गांव के समृद्ध वर्ग के एक व्यक्ति के पास ले जाकर कहा कि सरकार मेरा बेटा फर्स्ट डिवीजन से पास हुआ है। उस आदमी ने अपनी टांगे टेबल के ऊपर रखते हुए कहा- अच्छा फर्स्ट डिवीजन से पास किए हो…. मेरे पैर दबाओं…

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यह एक ऐसा उदाहरण था जिससे साफ था कि उच्च तबके के लोगों को छोटे तबके के लोगों का कुछ भी बड़ा करना रास नहीं आता था। यह उनके सम्मान की वजह भी नहीं बनता था।

अपने कार्यकाल में किए कई बड़े फैसले

1977 के दौर में 163 दिनों के लिए जब कपूरी ठाकुर ने कार्यभार संभाला था उस दौरान उन्होंने कई अहम फैसले लिए थे। उनके इन फैसलों में सबसे बड़े फैसले थे आठवीं तक की शिक्षा मुफ्त कर दी गई थी। उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा मिला था। सरकार ने 5 एकड़ तक की जमीन पर मालगुजारी खत्म कर दी थी।

पहला राज्य बना बिहार

इसके बाद साल 1977 में जब वह दोबारा मुख्यमंत्री बने तो इस दौरान उन्होंने एससी-एसटी के अलावा ओबीसी के लिए भी आरक्षण लागू करने का फैसला किया। बता दें उस दौरान ओबीसी वर्ग के लिए ऐसा फैसला लेने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना था। 11 नवंबर 1978 को उन्होंने महिलाओं के लिए तीन अहम फैसले लिए। अपने इस फैसले के तहत उन्होंने महिलाओं को भी इस आरक्षण का हिस्सा बनाया। खास बात यह रही कि महिलाएं किसी भी तबके की हो उनको एक स्तर पर आरक्षण देने की बात कही गई।

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कपूरी ठाकुर को लेकर एक और किस्सा काफी प्रसिद्ध है। दरअसल कपूरी ठाकुर की राजनीतिक जिंदगी ताउम्र संघर्ष से भरी रही है। साल 1978 में बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्होंने हाशिए पर धकेल दिए गए वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 26% आरक्षण लागू किया, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों उन्हें गालियां देने लगे। इतना ही नहीं अभी जाति वर्ग के लोगों ने उन पर तंज कसना भी शुरू कर दिया।

यह लोग उस दौरान कपूरी ठाकुर को अक्सर एक ही तंज कसते थे। कर कपूरी कर पूरा… छोड़ गद्दी, धर उत्तरा। खास तौर पर यह ताना इसलिए दिया जाता था क्योंकि कपूरी ठाकुर एक नई परिवार से ताल्लुक रखते थे।

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बिहार में बतौर सीएम पदभार संभाल चुके नीतीश और लालू यादव ने राजनीति की शुरुआत कपूरी ठाकुर की शरण में रहते हुए ही की है। कपूरी ठाकुर को लालू नीतीश का गुरु भी कहा जाता है।

कपूरी ठाकुर ने अपने पूरे जीवन पर्यंत बेहद सादा जीवन जिया। उन्हें आम लोगों के साथ और आम तौर की जिंदगी जीना बेहद पसंद था। अपने राजनीतिक काल में उन्होंने काफी प्रसिद्धि हासिल की। 17 फरवरी 1988 को अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उनका देहांत हो गया।