इस गांव में ब्राह्मण अपना सरनेम ‘खान’ लिखते हैं, जानिये क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी

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बिहार के सहरसा जिले का एक गांव अपने आप में बेहद पौराणिक और ऐतिहासिक है। इस गांव का इतिहास सदियों पुराना है। दर्ज आंकड़ों के तहत गांव में करीबन 75000 की आबादी है। हालांकि पिछले दशकों में यह आबादी काफी बढ़ गई है, जिसके आंकड़े दर्ज नहीं है। बिहार के इस गांव का इतिहास साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति, देश सेवा और भक्ति में योगदान के लिए हमेशा जाना जाता है।

ऐसे में इस गांव की एक और सबसे बड़ी खासियत है वह है हिंदू और इस्लाम धर्म की एकता और धार्मिक सहिष्णुता। इस गांव में हिंदू-मुस्लिम धर्म के सामंजस्य की जो तस्वीर देखने को मिलती है वह पूरे भारत में कहीं नहीं मिलती।

बनगांव का लिखित इतिहास बेहद पुराना है। ऐसे में बनगांव को लेकर यह धारणा है कि बौद्ध के समय में इस गांव का नाम आपन निगम रखा गया था। ज्ञान की खोज और अध्यात्म के विस्तार के सिलसिले में गौतम बुद्ध अपनी यात्रा के दौरान यहां भी आए थे। गांव में मुख्य तौर पर मैथिली भाषा का प्रयोग बोलचाल में किया जाता है।

वही इसके पड़ोसी गांव महर्षि के मंडन मिश्र को प्रसिद्ध सूर्य मंदिर की वजह से जाना जाता है। यह गांव और आसपास के क्षेत्र सदियों से ज्ञान धर्म और दर्शन के भंडार के तौर पर जाने जाते हैं।

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इस गांव का नाम बनगांव होने के पीछे कई कहानियां दर्ज है। ऐसे में इतिहासकारों के मुताबिक गांव के सबसे पहले बाशिंदों में से एक का नाम बनमाली हुआ करता था और उन्हीं के नाम पर इस गांव का नाम बनगांव रखा गया था। उनकी पहचान के चलते ही गांव की पहचान बनगांव के नाम से जानी जाने लगी थी। वही गांव की खासियत यह थी कि यह देश का एकलौता ऐसा गांव था जहां के लोग हिंदू होने के बावजूद अपना उपनाम खां लगाते हैं।

बिहार का बनगांव इतिहास के पन्नों में इस बात के लिए मुख्यतः जाना जाता है। कहा जाता है कि इस गांव की सबसे बड़ी खासियत धार्मिकता की एकता में देखने को मिलती है। यह देश का इकलौता ऐसा गांव है जहां के लोग हिंदू होने के बावजूद भी अपना उपनाम खां लगाते हैं। बनगांव के प्राचीन इतिहास से संबंधित कई आलेखों में इसकी कहानी बयां की गई है।

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सांख्यिकी स्तर पर बात करें तो बनगांव में मैथिली ब्राह्मणों की संख्या सबसे ज्यादा है। हालांकि अन्य जातियों के लोग भी इस गांव में रहते हैं। मैथिली ब्राह्मण मूल के ज्यादातर लोग अपना उपनाम खां लगाते हैं। खान उपनाम वैसे तो मुस्लिम धर्माव्लंबियों में पाया जाता है।

हिंदी धर्माव्लंबियों में खां उपनाम शब्द देशभर के लिए एक बेहद अनूठी बात है। ऐसे में अक्सर लोग इस गांव से जुड़े खां उपनाम का इतिहास तलाशते हैं। साथ ही लोग सवाल करते हैं कि आखिर कैसे ब्राह्मण जाति का होने के बावजूद भी किसी व्यक्ति का उपनाम खां हो सकता है?

इसकी कहानी बयां करने वाली इतिहासकार बताते हैं कि मुग़ल सल्तनत के शासको के कुजिल्वारों के कर वसूली के कौशल से प्रभावित होकर उन्हें खां उपनाम से नवाज़ा गया। इसके अलावा दूसरी धारणा यह भी है कि एक बार किसी अंग्रेज ने गांव की किसी युवती के सौंदर्य से प्रभावित होकर उसे जबरदस्ती शादी करने की योजना बनाई, लेकिन जब युवती के घरवालों ने यह सुना तो उनका खून खौल उठा और उन्होंने उस अंग्रेज को चलबाजी से मारने की योजना बनाई।

अपनी छल रणनीति के तहत उन्होंने कहा कि शादी पारंपरिक तरीके से की जाए। बारात के साथ उस अंग्रेज को फूस से घिरे पंडाल में जलाकर मार दिया गया। इसके बाद जब अंग्रेजी हुकूमत को गांव वालों की इस हरकत का पता चला तो उन्होंने आरोपियों की तलाश शुरू की। ऐसे में उन्हें धोखा देने के लिए उन्होंने अपना उपनाम खां बताना शुरू कर दिया।

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इस तरह गांव के लोग अपना उपनाम बदलकर अंग्रेजों के कहर से बच पाए। ऐसे में इन दोनों कहानियों में से सत्य क्या है यह कोई नहीं जानता। इतिहास में ब्राह्मण के साथ जुड़े खां उपनाम की यह दोनों कहानियां दर्ज है। वहीं ब्राह्मणों के अलावा कई ऐसी दूसरी जातियों के लोग भी हैं जो खां उपनाम के तौर पर लगाते हैं।

इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां मुस्लिम और हिंदू दोनों एक साथ त्योहार बनाते हैं। दोनों त्योहारों के मेलों में काफी धूम दिखाई पड़ती है। विश्व भर में जहां एक ओर धर्म और जाति के नाम पर कई जंगे छोड़ती है तो वही यह गांव एकजुटता की एक अनूठी मिसाल पेश करता है, जहां छोटे-मोटे मतभेदों को छोड़ धर्म और जाति के नाम पर कभी कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई।