गांधी-नेहरू परिवार का एक ऐसा दामाद, जिसे बगावत के लिए हमेशा किया जाता है याद

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साल 1930 में कांग्रेस धरना प्रदर्शन के दौरान कमला नेहरू की तबियत अचानक बिगड़ गई। संयोग से उस वक्त फिरोज उसी कॉलेज में ग्रेजुएशन कर रहे थे जिस कॉलेज के बाहर कमला नेहरू की तबीयत खराब हुई थी। कमला नेहरू के बेहोश हो जाने के बाद फिरोज ने उनकी मदद की और उन्हें उनके घर लेकर आये। यह पहली बार था जब फिरोज गांधी की इंदिरा से मुलाकात हुई।

धीरे-धीरे ये मुलाकाते बढ़ने लगी और साल 1933 में फिरोज गांधी ने पहली बार इंद्र से शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन इस दौरान कमला नेहरू ने शादी से साफ इंकार कर दिया उन्होंने कहा कि इंदिरा सिर्फ अभी 16 साल की हैं। कमला के इस तर्क से उस वक्त शादी की बात टल गई।

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इसके बाद धीरे-धीरे फिरोज उस परिवार के करीब आने लगे। साल 1934 में जब कमला नेहरू की पहली बार तबीयत बिगड़ी तो उन्हें इलाज के लिए यूरोप भेजा गया। इस दौरान फिरोज उनके साथ गए। इसके बाद 28 फरवरी 1936 को जब कमला नेहरू का निधन हुआ उस वक्त फिरोज उनके सिरहाने बैठे थे। ऐसे में इन तस्वीरों से यह साफ था कि फिरोज अब धीरे-धीरे नेहरू परिवार का खास हिस्सा बनने लगे थे।

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इसके बाद फिरोज और इंदिरा की शादी साल 1942 में हुई। हालांकि उस दौरान जवाहरलाल नेहरू इंदिरा और फिरोज की शादी के बिलकुल खिलाफ थे। उन्होंने इसके लिए महात्मा गांधी को भी कहा था कि वह इंदिरा को समझाएं। लंबी लड़ाई और जाति विवाद को दरकिनार करते हुए महात्मा गांधी की छत्रछाया में दोनों की शादी साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुई।

इसके बाद 5 साल दोनों के जीवन के पारिवारिक साल रहें। इस दौरान साल 1944 में राजीव गांधी और साल 1946 में संजय गांधी का जन्म हुआ। आजादी के बाद फिरोज और इंदिरा गांधी दोनों बच्चों के साथ इलाहाबाद में ही रहने लगी। इस दौरान फिरोज द नेशनल हेराल्ड के प्रबंधक निर्देशक बनाए गए। यह अखबार जवाहरलाल नेहरू ने शुरू किया था जिसकी कमान अब वह संभाल रहे थे।

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इसके बाद साल 1952 में आजाद भारत में पहली बार आम चुनाव हुए। इस दौरान फिरोज गांधी उत्तर प्रदेश के रायबरेली से सांसद चुने गए। तब तक इंदिरा दिल्ली आ गई और इस दंपति के बीच मनमुटाव शुरू हो गया था। हालांकि इंदिरा ने इसके बाद रायबरेली जाकर फिरोज के समर्थन में चुनाव प्रचार प्रसार की कमान संभाली थी। ऐसे में दोनों के बीच का पारिवारिक मनमुटाव राजनीति में नजर नहीं आया।

धीरे-धीरे वक्त बीता गया इसके बाद साल 1955 में फिरोज गांधी ने अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया। साल 1955 में उनके चलते ही उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया के भ्रष्टाचारों का खुलासा हुआ। यह भ्रष्टाचार एक जीवन बीमा कंपनी के जरिए किया गया था। इसके चलते डालमिया को कई महीने जेल की सजा भी काटनी पड़ी थी।

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फिरोज के फैसले का नतीजा यह हुआ कि अगले ही साल 245 जीवन बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके एक नई कंपनी बना दी। इस कंपनी को एलआईसी के नाम से जाना जाता है। फिरोज गांधी का परिवार से बगावत का सुर यही नहीं थमा। इसके बाद साल 1957 में फिरोज गांधी रायबरेली से दोबारा सांसद चुने गए।

साल 1958 में उन्होंने नेहरू सरकार को एक और झटका दिया। इस दौरान लोकसभा सत्र के दौरान फिर उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी ने कुछ ऐसी कंपनियों के बाजार से कहीं ज्यादा कीमत पर करीबन सवा करोड रुपए के शेयर खरीदे हैं, जिनकी हालत बेहद खराब चल रही है।

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फिरोज ने इस दौरान खुलासा करते हुए बताया कि यह कंपनियां कोलकाता के एक कारोबारी हरिदास मूंदड़ा की है। सत्ताधारी पार्टी के ही सांसद की तरफ से हुए इस खुलासे ने विपक्ष को जैसे मन मांगी मुराद दे दी हो। घर के भेदी ने ही कांग्रेस की सत्ता ढहा दी थी। ऐसे में यह दूसरी बार था जब फिरोज ने परिवार से बगावत के सुर तेज किए थे।

फिरोज गांधी के इस खुलासे के बाद तत्कालीन वित्तमंत्री कृष्णमचारी को जांच पड़ताल में हुए खुलासे के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। यह पहली बार था जब फिरोज गांधी के लगाए गए आरोपों से नेहरू सरकार की साफ-सुथरी छवि पर जब कोई बड़ी चोट लगी थी।

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फिरोज गांधी के यही बगावती सुर थे कि अपने अंतिम दिनों में वह अकेले थे। जब उनका अंतिम समय आया तो ना ही उनके साथ उनकी पत्नी इंदिरा थी और ना ही बेटे राजीव और संजय…मालूम हो कि 8 सितंबर 1960 को फिरोज गांधी का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ था।