मुंबई के दो दोस्तों ने लंदन में शुरू किया वड़ा पाव का बिजनेस, रोड पर की ब्रांडिंग

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मुंबई जैसे बड़े शहर की अगर बात करें तो वहां की सबसे बड़ी स्पेशलिटी वड़ा पाव है और जगह जगह मिलता है जिसकी मात्र कीमत सिर्फ 10 रूपए है मुंबई के दो दोस्त भी कॉलेज में पढ़ने के दौरान हर रोज वड़ा पाव खाया करते थे और पढ़ने के सिलसिले में दोनों लंदन चले गए और वहां अच्छी नौकरी भी नसीब हो गई लेकिन मुंबई जैसा वड़ा पाव और चाय को दोनों ही मिस करते थे.

2009 में मंदी होने पर इनमे से एक दोस्त की नौकरी चली गई. बस मौका था इनका लंदन में वड़ा पाव का बिजनेस शुरू करने का और आज ये दोनों यूके में 5 रेस्टोरेंट्स के मालिक है और इनका सालाना टर्नओवर लगभग 1.5 मिलियन पाउंड है.

दो दोस्तों की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी…

बात 1999 की है, हम पिछले 25 साल से दोस्त है और मुंबई के रिज़वी कॉलेज में होटल मैनेजमेंट से ग्रेजुएशन की पढाई कर रहे थे. कई एंट्रेंस एग्जाम देने के बाद हमे यूके की यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला. 2003 में हम दोनों को साथ में इंटर्नशिप ऑफर हुई. कंपनी को हमारा काम बहुत पसंद आया जिससे हमारे वीजा की अवधि भी बढ़ी. लेकिन 2009 की छाई मंदी के चलते सुजय की जॉब चली गई.

वड़ा पाव के बिज़नेस की बात की जाए तो लंदन में रहने के दौरान हम दोनों अक्सर मुंबई वाला वड़ा पाव मिस करते थे. साथ ही उबली हुई चाय पीने का मन होता था लेकिन मिल नहीं पाती थी सुजय की जॉब गई तो हमने प्लान किया कि क्यों न दोनों मिलकर वड़ा पाव का बिजनेस शुरू करें. सेविंग्स और पैसे की कमी के चलते हमने डिसाइड किया कि सुबोध जॉब करेगा और सुजय बिजनेस को संभालेगा. कई मुश्किलों बाद पौलेंड के एक युवक से कैफे में काम करने की जगह मांगी और बस फिर वहां से हमारे इस बिजनेस की शुरुवात हुई.

फिर हमें याद आया लंदन में कोई चाय की डिलेवरी दुकान पर जाकर नहीं देता था जैसे हमारे भारत में होता था तो हमने आस पास की सभी दुकानों पर जाकर चाय डिलेवर करना शुरू किया और चाय की डिलेवरी करने जाते तो वड़ा पाव के आर्डर साथ लेकर आते. यह काम हमने आस पास की दुकानों के साथ ही साथ पूरे एरिया में करना शुरू कर दिया.

देखते ही देखते ग्राहक हमारे पास आने लगे और हमें ऑर्डर्स भी मिलने लगे जिसके चलते हम जहां 400 पाउंड किराया कैफे में दे रहे थे, बाद में वह 1500 पाउंड तक पहुंच गया. आसपास के लोग जानने लगे थे. सुबोध ने भी जॉब छोड़ दी और अपना पूरा टाइम हम दोनों अपने इस काम को देने लगे एक किचन का काम देखता था तो दूसरा रेस्टोरेंट संभालता था.

2011 में हमने बड़ी जगह रेंट पर ले ली थी. हमारे ऑफिस कलीग्स ने भी अपनी जॉब छोड़ दी थी और हमारे साथ हमारे इस काम में जुड़ गए. सुबोध की पत्नी ने हमारा किचन का काम संभालने में काफी मदद की. हालात ऐसे हो चुके थे कि पुलिस पूछताछ के लिए आने लगी, यहां इतनी भीड़ क्यों लग रही है और असल में भीड़ लगने की एक वजह ये भी थी कि हमारे यहां वड़ा पाव सस्ता बहुत था और लंदन में इतना सस्ता कभी कुछ नहीं था.

हमारे पास कैटरिंग के छोटे और बड़े दोनों आर्डर आने लगे क्यूंकि लंदन में छोटे आर्डर कोई नहीं लेता था और सबको हमारा काम काफी पसंद भी आया. जैसे-जैसे ब्रांच बढ़ी, वैसे-वैसे हमारे मैन्यू के आइटम भी बढ़ते चले गए और लॉकडाउन के बाद भी अगस्त में एक और ब्रांच शुरू की यही वजह रही की हमें देखकर कई और लोगों ने वड़ा पाव का काम शुरू किया और अब बस अपने ब्रांड को इंटरनेशनल बनाने पर काम कर रहे है.