ताजमहल में ईर्द-गिर्द लगी जाली करती है लोगों को आकर्षित, जानिये क्या है इनकी पूरी हकीकत

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उत्तर प्रदेश के आगरा में स्थित ताजमहल का हर कोना अपने आप में इतिहास की एक अलग कहानी बयां करता है। ऐसे में आज हम आपको प्यार की दास्तां बयां करने वाले ताजमहल के मुख्य मकबरे यानी शाहजहां और मुमताज के बने मकबरे के आसपास की संगमरमर की जालियों के इतिहास के बारे में बताएंगे। साथ ही बताएंगे कि शाहजहां ने यहां संगमरमर की नहीं बल्कि सोने की जालियां लगवाई थी। अब ऐसे में आप सोच रहे होंगे कि अगर सोने की जालियां लगवाई थी, तो वह कहां गई? उन्हें किसने हटाया और इसके बाद यह सोने की जगह संगमरमर की जालियां किसने लगावाई?

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दरअसल ताजमहल में प्रवेश करते ही सैलानी शाहजहां और मुमताज की कब्र के चारों और बने अष्टकोण संगमरमर की जाली को देखकर उस समय के इतिहास के पन्नों में खो जाते हैं। ऐसे में इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानी बताती है कि शाहजहां ने मुमताज की कब्र के चारों और सोने की जाली लगवाई थी। इस बात का जिक्र केसी मजूमदार ने भी अपनी किताब इंपीरियल आगरा ऑफ द मुगल में किया है।

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केसी मजूमदार ने अपनी किताब में बताया है कि ताजमहल का निर्माण 1632 से 1648 के बीच करवाया गया था। इस दौरान 1666 में शाहजहां की मौत के बाद जब उसे मुमताज की कब्र के बराबर में उन्हें दफन किया गया तब यहां से यह सोने की जालियां हटवा दी गई। बता दें मौजूदा समय में यहां सोने की जालियों की जगह संगमरमर की बेहद खूबसूरत जालियां बनवाई गई है और यह औरंगजेब के समय में लगाई गई थी।

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केसी मजूमदार की किताब में इसके समय काल का एक और भी जिक्र किया गया है। उन्होंने अपनी किताब में बताया है कि इन्हें बनाने में करीबन 10 साल का समय लगा था। अष्टकोणीय इस जाली में पच्चीकारी का शानदार काम किया गया है। साथ ही इसमें एमराल्ड, नीलम, गोमेद, कार्नेलियन और जैस्पर जैसे बेशकीमती पत्थर भी लगाए गए हैं।

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मालूम हो कि शाहजहां के ताजमहल पर लगा गुंबद कलश 466 किलोग्राम सोने से बनवाया गया था। साल 1810 में अंग्रेजी अधिकारी जोसेफ टेलर ने इसे उतरवा लिया था। इतना ही नहीं उन्होंने इसकी जगह पर सोने की पॉलिश किया हुआ तांबे का कलश लगा दिया था। बता दें कि इस कलश को अब तक दो बार और बदला जा चुका है। इतिहास के पन्नों में दर्ज तारीखों के मुताबिक साल 1870 और 1940 में भी यह कलश बदला गया था।

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इसके अलावा भी ताजमहल के अलग-अलग कोनों की अलग-अलग कहानी है। इसके चांदी के दरवाजे और मोतियों की चादर भी इतिहास के पन्नों में दर्ज अलग-अलग कहानी बयां करती है। मुमताज की कब्र पर चढ़ाई गई 4000 मोतियों की चादर भी बेहद खूबसूरत हुआ करती थी, जिसे बाद में लूट लिया गया था। इसका इतिहास राजकिशोर राजे ने अपनी किताब में इस कहानी को बयां किया है।

संभार- इंपीरियल आगरा ऑफ द मुगल, केसी मजूमदार(लेखक)