इंदिरा का ‘गांधी’, गांधी सरनेम की इस Love story ने राजनीति में मचा दी थी खलबली

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गांधी परिवार जितना बड़ा है उतना ही इसके सर नेम के साथ जुड़ा इतिहास भी गहरा है। गांधी सरनेम महात्मा गांधी की देन था। इस सरनेम की कहानी को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को जितनी बार पलटा जाए उतनी बार एक नई कहानी सामने आती है।

इसकी शुरुआत जवाहरलाल नेहरु की बेटी इंदिरा से हुई थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने नेहरु की बेटी इंदिरा यानी इंदु के लिए फिरोज को अपना सरनेम गांधी दिया, जिसके बाद वह इंदिरा गांधी नाम से जानी जाने लगी। क्या है यह गांधी सरनेम की कहानी…उसका एक पक्ष आज हम आपको बताने वाले हैं।

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19 नवंबर 1917 को पंडित मोतीलाल नेहरू के बेटे जवाहरलाल नेहरू के घर में एक बेटी का जन्म हुआ। उनका नाम रखा गया इंदु…इंदु जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू की इकलौती संतान थी। उन्हें इंदिरा कहकर उनके दादा पंडित जवाहरलाल नेहरु पुकारा करते थे। वह अक्सर इंदिरा को उनके नाम का मतलब भी समझाया करते थे। इंदिरा का शाब्दिक अर्थ होता है कांति, लक्ष्मी और शोभा।

इंदिरा गांधी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई इलाहाबाद में से ही की थी। यह वह दौर था जब देशभर में आजादी की लड़ाई के लिए जगह-जगह धरना प्रदर्शन चल रहे थे। इसी धरना प्रदर्शन के दौरान कमला नेहरू एक कॉलेज के बाहर बेहोश हो गई। उस दौरान फिरोज उन्हें उनके घर ले गए और उनकी काफी देखभाल की। फिरोज इस समय कांग्रेस नेता के तौर पर युवाओं का नेतृत्व करते थे। उनकी पार्टी में युवा नेता के तौर पर एक अच्छी पहचान थी।

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इसके बाद फिरोज इंदिरा के परिवार में आने जाने लगे। धीरे-धीरे परिवार में उनकी पहचान बढ़ने लगी। इसी दौरान इंदिरा से भी उनकी नजदीकियां बढ़ने लगी और दोनों को प्यार हो गया। कुछ समय बाद कमला नेहरू को फिरोज और इंदिरा के बारे में पता चला। उन्हें काफी गुस्सा आया और उन्होंने दोनों के अलग-अलग धर्मों के होने की वजह से काफी समझाने की कोशिश की।

बात फिरोज के शुरूआती जीवन की करे तो फिरोज एर पारसी परिवार से ताल्लुक रखते थे। 12 सितंबर 1912 को मुंबई के फोटे मूलजी नरीमन हॉस्पिटल में जन्मे फिरोज खान गुजरात के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम जहांगीर और मां का नाम रतिबाई था। पेशे से फिरोज के पिता एक इंजीनियर थे। पांच भाई बहनों के बीच पले फिरोज इलाहाबाद पढ़ाई के उद्देश्य से आए थे और इसी दौरान उनकी मुलाकात इंदिरा से हुई।

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धीरे-धीरे यह बात घर की चार दीवारों से निकलकर राजनीतिक गलियारों में गूंजने लगी। ऐसे में जवाहरलाल नेहरू को भी राजनीति पहचान और नाम हाथ से जाने का डर सताने लगा। दोनों के अलग-अलग धर्मों के होने की वजह से भारतीय राजनीति में इस बात को लेकर काफी विवाद खड़ा हुआ। इसके बाद नेहरू इस मामले में सलाह लेने के लिए महात्मा गांधी के पास पहुंचे।

पहले तो महात्मा गांधी ने नेहरू की पूरी बात सुनी और फिर उन्होंने फैसला किया कि वह फिरोज को गांधी सरनेम देंगे। इसके बाद फिरोज खान को फिरोज गांधी के नाम से जाना जाने लगे। जब फिरोज गांधी बन गए तो इंदिरा की उनसे शादी हो गई और इंदिरा…इंदिरा गांधी के नाम से जाने जाने लगी। बता दे दोनों ने साल 1942 में हिंदू रीति-रिवाज से शादी की।

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फिरोज गांधी पहले से राजनीति का हिस्सा थे। फिरोज के साथ रहते हुए इंदिरा भी राजनीति में आने लगी। ऐसे में एक बात काफी चर्चाओं में रही थी कि इंदिरा जब भी चुनाव प्रचार के लिए गुजरात जाती तो वह अपनी साड़ी का पल्लू अपने सर पर रख लेती। एक दौर वो भी आया जब इंदिरा और फिरोज अलग हो गए। इंदिरा फिरोज से अलग तो हो गई, लेकिन गुजरात से वह कभी अलग नहीं हुई। वह खुद को हमेशा गुजरात की बहु मानती थी।

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हिंदू और पारसी धर्म कि यह राजनीति आज भी जब-जब चुनाव आते हैं तो गर्मा जाती है। आज भी गांधी सरनेम को लेकर विवाद जरूर खड़ा होता है।