इंद्र कुमार गुजराल को जब रात 2 बजे उठाकर कहा- चलिये आपको पीएम बनना है…पढ़ें दिलचस्प किस्सा

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एक पत्रकार से प्रधानमंत्री तक का सफर इंद्र कुमार गुजराल की जिंदगी का सबसे अहम पड़ाव रहा। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल भारतीय राजनीति का प्रखर चेहरा माने जाते हैं, जिन्होंने कभी अपने उसूलों और फैसलों में समझौता नहीं किया। बात चाहे कोई भी हो उन्होंने हर कीमत पर अपने उसूलों और सही नियमों को ही अपने फैसलों का हिस्सा रखा। इंद्र कुमार गुजराल भारत के 12वें प्रधानमंत्री रहे। उनके प्रधानमंत्री बनने का किस्सा बेहद दिलचस्प है।

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अवतार नारायण और पुष्पा गुजराल के घर 4 दिसंबर 1919 को पंजाब के झेलम(अब पाकिस्तान का हिस्सा है) में इंद्र कुमार गुजराल का जन्म हुआ। उन्होंने अपने शुरुआती शिक्षा वहीं स्कूलों में की। इसके बाद वह डीएवी कॉलेज और हेली कॉलेज ऑफ कॉमर्स और फॉर्मल क्रिश्चियन कॉलेज में पढाई करने के लिए लाहौर चले गए।

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साल 1942 में गुजराल अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के तहत जेल भी गए। यहीं से गुजराल के राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद 26 मई 1945 को लाहौर में उन्होंने अपने कॉलेज की दोस्त और काफी प्रसिद्ध कवि शीला भसीन से शादी की। बता दे गुजराल के दो बेटे विशाल गुजराल और नरेश गुजराल है।

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अपनी राजनीतिक शुरुआत के बाद ही वह कांग्रेस की नजर में आ गए थे। यही कारण था कि बीबीसी की हिंदी सेवा में एक पत्रकार के तौर पर काम करने वाले गुजराल को साल 1971 में इंदिरा गांधी की सरकार ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी।

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इंद्र कुमार गुजराल अपने कठोर रवैया और दृढ़ फैसलों के लिए हमेशा जाने जाते रहे हैं। यही कारण था कि संजय गांधी से कभी इंद्र कुमार गुजराल की नहीं बनी। दोनों के बीच हमेशा 36 का आंकड़ा ही नजर आया। किस्सा साल 1975 का है जब इंदिरा गांधी राजनीति गलियारों में चौतरफा घिर चुकी थी। ऐसे में अपनी मां को बचाने के लिए संजय गांधी उत्तर प्रदेश से लोगों को दिल्ली ला रहे थे। इसके लिए संजय गांधी कवरेज दूरदर्शन पर दिखाना चाहते थे।

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ऐसे में क्योंकि उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इंद्र कुमार गुजराल के हाथ में था तो संजय गांधी ने इसके लिए उनसे इजाजत मांगी, लेकिन इंद्र कुमार गुजराल ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। ऐसे में संजय गांधी को मना करने का हर्जाना इंद्र कुमार गुजराल को अपना सूचना एवं प्रसारण मंत्री पद गवा कर चुकाना पड़ा। इसके बाद भी कई बार ऐसे मौके आए जब इंद्र कुमार गुजराल और संजय गांधी एक दूसरे के फैसलों में रजामंदी नहीं दिखाते थे।

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दोनों के बीच की तनातनी पार्टी के फैसलों में हमेशा नजर आ जाती थी। संजय गांधी जब भी कोई फैसला करते और गुजराल को वह सही नहीं लगता तो गुजराल उस फैसले पर साफ तौर से इंकार कर देते। गुजराल हर समय संजय गांधी और इन्द्रा के सामने अपना पक्ष जरूर रखते थे।

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दोनों के बीच का विवाद इस कदर बढ़ने लगा था कि साल 1980 में गुजराल ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और जनता दल में शामिल हो गए। उस दौरान वीपी सिंह के कार्यकाल में वह 1989 से 1990 तक विदेश मंत्री पद पर रहे। इसके बाद साल 1996 में एचडी देवगौड़ा सरकार ने भी उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई।

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एच डी देवगौड़ा की सरकार में विदेश मंत्री के पद पर बैठे गुजराल ने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों को सुधारने के प्रयासों में काफी लंबे स्तर पर काम किया। यही कारण था मंत्री के तौर पर गुजराल को हमेशा याद किया जाता रहा है।

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साल 1996 में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार महज 13 दिनों में ही बहुमत साबित नहीं कर पाई और ऐसे में सरकार गिर गई। इसके बाद यूनाइटेड फ्रंट की तरफ से एच डी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री पद सौंपा गया, जिन्हें कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी। दूसरी तरफ सोनिया गांधी की सहमति से कांग्रेस के कोषाध्यक्ष श्री सीताराम केसरी पार्टी के अध्यक्ष पद पर बैठे हुए थे। अध्यक्ष बनने के बाद सीताराम केसरी को लगा कि वह देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। फिर उन्होंने इसकी जुगत बिठानी शुरू कर दी।

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इस दौरान उन्होंने अपने नाम के पक्ष में होने वाले नेताओं की गोलबंदी की। इतना ही नहीं वह विपक्ष के नेताओं से भी मिले, लेकिन कोई भी दल उन्हें समर्थन नहीं देना चाहता था। ऐसे में पीएम पद के लिए नए नेता की खोज शुरू हो गई। इस दौरान कई बड़े पद पर बैठे नेताओं में आपसी मतभेद भी हुए। कोई भी एक दूसरे के नाम पर सहमति देने को राजी नहीं हुआ।

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इस दौरान प्रधानमंत्री पद के नाम के चयन के लिए पूरे दिन भर बैठक चली, लेकिन किसी के नाम पर भी पक्ष विपक्ष एक स्तर पर हामी नहीं भर पाए। ऐसे में इंद्र कुमार गुजराल का नाम सामने आया। रात में इंद्र कुमार गुजराल के नाम पर सहमति बनी। वहीं उस समय गुजराल सो रहे थे। ऐसे में करीबन रात 2:00 बजे आनन-फानन में उन्हें उठाकर बैठक में बुलाया गया और उन्हें सूचना दी गई कि उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया है।

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इसके बाद गुजराल ने 21 अप्रैल 1997 को और देश के 12वें प्रधानमंत्री के तौर पर पदभार संभाला। गुजराल का कार्यकाल कुल 11 महीनों का था। 1999 में चुनाव के लिए नामांकित नहीं हुए और इस तरह उन्होंने राजनीतिक से 11 महीने के प्रधानमंत्री रहने के बाद संन्यास ले लिया।