जब वसुंधरा राजे को धौलपुर से लौटना पड़ा, आम महिला की तरह हुई थी घरेलु उत्पीड़न का शिकार

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वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान की रियासत से लेकर केंद्र में मंत्री रहने तक एक काफी बड़ा नाम है, लेकिन वसुंधरा राजे सिंधिया को यह सब कुछ विरासत में नहीं मिला है। उन्होंने अपने दम पर सब कुछ हासिल किया है। इसकी कहानी उनकी शादी के बाद शुरू हुई थी। धौलपुर के राजा हेमंत सिंह से वसुंधरा की शादी हुई थी हालांकि हेमंत सिंह और उनका रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चला और दुष्यंत सिंह के जन्म के साथ ही दोनों आपसी रजामंदी से अलग हो गए।

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राजघराने में जन्मी वसुंधरा

8 मार्च 1953 को वसुंधरा राजे का जन्म मुंबई में हुआ। वसुंधरा राजे ग्वालियर राजघराने की बेटी है। जीवाजीराव सिंधिया और विजिया राजे सिंधिया के घर वसुंधरा राजे का जन्म हुआ। वसुंधरा राजे सिंधिया हालांकि किसी पहचान की मोहताज नहीं है फिर भी हम बता दें कि कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया उनके भाई हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके भतीजे हैं।

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जब घौलपुर की बनी बहु

वसुंधरा राजे सिंधिया का जन्म जरूर राजघराने में हुआ था, लेकिन उन्होंने भी एक आम महिला की तरह तिरस्कार अपमान झेला था। हालांकि उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी लड़ाई लड़ती रहे और आज वो जिस बुलंदियों पर है यह उनके हौसले की बड़ी मिसाल है। राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की शादी राजस्थान के धौलपुर रियासत के इकलौते वारिस हेमंत सिंह से हुई थी हालांकि हेमंत सिंह असल मायने में धौलपुर की महारानी बलविंदर कौर के बेटे नहीं थे।

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हेमंत सिंह को गोद लिया था महरानी ने

दरअसल हेमंत सिंह को उनकी नानी यानी धौलपुर की महारानी बलविंदर कौर ने गोद लिया था। राजा की अचानक मौत और रियासत का वारिस ना होने के कारण उन्होंने अपनी बेटी के बेटे हेमंत सिंह को गोद लिया और राजा बना दिया। इस मामले पर इतिहास बयां करने वाले ज्ञाताओं की माने तो भारत को आजादी मिलने के बाद सिंधिया स्टेट और धौलपुर रियासत के बीच काफी कट्टर दुश्मनी हुआ करती थी। ऐसे में भारत को आजादी मिलने के बाद भारत सरकार की शर्तों के तहत दोनों रियासतों का राजनीतिक समीकरण बदल गया और सिंधिया परिवार की बेटी धौलपुर की सियासत की बहू बनीं।

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रियासत में हिस्सेदारी के लिए कोर्ट पहुंचा मामला

दोनों परिवारों के समझौते के तहत वसुंधरा राजे सिंधिया और हेमंत सिंह की शादी तो हो गई, लेकिन यह रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चला दुष्यंत सिंह के जन्म के समय ही दोनों का तलाक हो गया। एक बार फिर दोनों राज परिवारों के बीच ठन गई। महाराज और राजकुमारी में तलाक होने के बाद वसुंधरा राजे सिंधिया ग्वालियर वापस आ गई। 1978 में दुष्यंत की नानी विजिया राजे सिंधिया ने नाती की ओर से धौलपुर के महाराज हेमंत सिंह की रियासत में हिस्सेदारी के लिए अदालत में याचिका दायर की।

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कोर्ट ने दुष्यंत के पक्ष में सुनाया फैसला

धौलपुर रियासत में हिस्सेदारी का मामला काफी लंबा चला। मई 2007 में हेमंत सिंह और दुष्यंत सिंह के बीच अदालत में एक समझौता हुआ। इसके बाद धौलपुर महल का मालिकाना हक दुष्यंत सिंह को मिल गया। कोर्ट ने हेमंत सिंह के बेटे दुष्यंत सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके बाद धौलपुर रियासत का काफी बड़ा हिस्सा दुष्यंत सिंह को विरासत के तौर पर मिला।

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समझौते के तहत दुष्यंत को धौलपुर महल मिला साथ ही शिमला वाला घर भी दुष्यंत सिंह के हिस्से आ गया। इसके अलावा एक दर्जन तक विंटेज कारें, धौलपुर का खजाना भी उन्हें मिल गया। जबकि हेमंत सिंह को दिल्ली में पंचशील मार्ग स्थित घर और दूसरी प्रॉपर्टी हिस्से में मिलीय़ इसके बाद हेमंत सिंह अपनी दूसरी पत्नी और के साथ दिल्ली आ गए।

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विरासत में अपनी हिस्सेदारी मिलने के बाद वसुंधरा राजे सिंधिया के बेटे दुष्यंत सिंह ने धौलपुर पैलेस का नाम बदलकर राजनिवास पैलेस रख दिया और उनकी कंपनी नियर हेरीटेज होटल ने उसे होटल बना दिया। आज के दौर में यह अपनी सुंदरता हरियाली और प्रतिष्ठा के लिए जाना जाता है।

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वसुंधरा राजे सिंधिया का राजनीतिक सफर साल 1984 में शुरू हुआ था। इस दौरान उन्होंने मध्यप्रदेश के भिंड से लोकसभा क्षेत्र में चुनाव लड़ा था, जिसमें उनकी हार हुई थी। उस वक्त पूरे देश में इंदिरा गांधी की हत्या की वजह से कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल रही थी और इसी का फायदा उठाकर कांग्रेस के प्रत्याशी कृष्ण सिंह ने वसुंधरा राजे सिंधिया को भारी मतों से हराया था।

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वसुंधरा राजे सिंधिया को 1984 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया था। इसके बाद सन् 1985-87 के बीच वसुंधरा बीजेपी युवा मोर्चा राजस्थान की उपाध्यक्ष भी रही थी। उनकी कार्य क्षमता विनम्रता और पार्टी के लिए खासा लगाव और वफादारी के चलते 1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेई मंत्रिमंडल में सिंधिया वसुंधरा को विदेश राज्यमंत्री का पदभार सौंपा गया।

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वसुंधरा राजे सिंधिया के काम और उनकी निष्ठा को देखते हुए साल 1999 में फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री के तौर पर स्वतंत्र प्रभार दिया गया। इसके बाद भैरों सिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें राजस्थान में बीजेपी राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। वसुंधरा राजे सिंधिया अब तक कुल 13 बार लोकसभा की सदस्य रह चुकी है। इसके अलावा वह साल 2003 से 2008 और 2013 से 2018 तक बीजेपी काल में राजस्थान की मुख्यमंत्री भी रह चुकी है।