लालू यादव और राबड़ी देवी के राज में कैसा था बिहार, जाने क्या है बिहार राजनीति का पूरा इतिहास

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बिहार की राजनीति का जब-जब जिक्र होता है तब तब बिहार के लाल कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव का नाम हर किसी के दिमाग में घूमने लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का नाम काफी प्रख्यात है। भारतीय राजनीति में लालू प्रसाद यादव राजनीति के एक ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने पार्टी की नींव रखने से लेकर मुख्यमंत्री तक बनने तक जनता के दिलों में घर बनाने के लिए सड़कों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक की हर गली मापी थी।

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लालू प्रसाद यादव को लेकर अक्सर ये कहा जाता था कि उनके अंदर काम करने वाले सभी अधिकारी उनकी चुस्ती और फुर्ती से डरा करते थे। उन्हें डर लगता था कि लालू प्रसाद यादव कभी भी औचक निरीक्षण पर आ सकते हैं और उन पर उनकी गाज गिर सकती है। दरअसल अपने राजनीतिक काल में ये लालू की सबसे बड़ी खासियत रही था कि वह हर जगह जाकर खुद हालातों का जायजा लिया करते थे।

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बिहार के गोपालगंज में साल 1948 में एक गरीब परिवार में जन्मे लालू प्रसाद यादव ने राजनीतिक शुरुआत जयप्रकाश आंदोलन से की थी। उस दौरान वह छात्र नेता थे। साल 1977 में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद ने पहली बार जीत हासिल कर लोकसभा में एंट्री की थी। इस दौरान लालू प्रसाद यादव 29 साल के थे। 1980 से 1989 तक वह 2 बार विधानसभा के सदस्य भी रहे थे और विपक्ष के नेता पद पर भी विराजमान रहे। इसके बाद साल 1990 में वह बिहार के मुख्यमंत्री बने।

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लालू यादव का औचक निरीक्षण और लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को जानना लोगों के दिलों पर इस तरह सवार था कि यह पहली बार हुआ था जब किसी जीवित मुख्यमंत्री की जीवनी किताबों का हिस्सा बनी थी। साल 1993 में लालू प्रसाद की यादव की जीवनी बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। हालांकि इस दौरान इस मुद्दे को लेकर काफी विवाद खड़ा हुआ था और विपक्ष ने इस पर नाराजगी भी जाहिर की थी।

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लोगों के सर लालू प्रसाद यादव का काम और नाम इस कदर सवार था कि साल 1995 में वे भारी बहुमत से विजयी हुए। इसके बाद साल 1997 में जब उनके खिलाफ चारा घोटाले मामले में आरोप पत्र जारी किया गया। इस दौरान उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। ऐसे में उन्होंने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने का एक नया पैंतरा तलाशा। उन्होंने इसके लिए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता में लाने का फैसला किया।

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पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंप कर लालू प्रसाद यादव राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष पद पर बने रहे। इसके बाद उन्होंने सत्ता की कमान भी धीरे-धीरे राबड़ी देवी के हाथ में सौपना शुरू कर दिया। वहीं दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में लगातार फंसते जा रहे थे। इस दौरान उन्हें काफी लंबा समय जेल में भी बिताना पड़ा था। साल 2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए की करारी हार के बाद लालू रेल मंत्री बने बिहार के सारण निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल कर उन्होंने 15वीं बार लोकसभा में एंट्री की।

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धीरे-धीरे बिहार की राजनीति का आंकड़ा बदलने लगा। लालू प्रसाद यादव पर कई घोटालों में लिप्त होने की बातें सुर्खियों में छाने लगी। ऐसे में लालू प्रसाद की सत्ता डगमगाने लगी। बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद का नाम धीरे-धीरे धुंधला पड़ना शुरू हो गया। लालू प्रसाद यादव पर सबसे बड़ा घोटाला जो सामने आया वह चारा घोटाला था। बता दे यह घोटाला 950 करोड़ रुपए का था।

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बिहार की राजनीति की बदलती झलक में लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक काल को जंगलराज का नाम लिया जाने लगा। तब से लेकर अब तक लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के राजनीतिक काल को जंगलराज का नाम दिया जाता है। ऐसे में जनता भी धीरे-धीरे लालू के विरोध होने लगी। यही कारण था कि साल 2009 में बिहार विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू के विरोधी नीतीश कुमार को भारी बहुमत से जिताया।

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हैरान करने वाली बात यह थी कि एक लंबे समय से बिहार की राजनीति पर अपनी पकड़ बनाने वाली राष्ट्रीय जनता दल को इस विधानसभा चुनाव में केवल 4 सीटों पर ही जीत मिली। ऐसे में जनता के इस फैसले ने यह साफ कर दिया था कि अब बिहार से लालू प्रसाद यादव की परछाई की चमक धीमी होने लगी थी।

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बिहार की राजनीति को उस समय के दौर में बदलती राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा देखा जा रहा था। कहा जाता था कि यह बिहार के लोगों ने दिखा दिया है कि यह 21वीं सदी की राजनीति है जो ना जातिवाद पर काम करती है ना भ्रष्टाचार पर।

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इन दिनों लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला मामले में जेल में सजा काट रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर लालू यादव के दो लाल तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव इस चुनाव में पहली बार पिता की परछाई के बिना चुनाव लड़ने वाले हैं। ऐसे में जहां एक ओर आरजेडी की अग्निपरीक्षा है तो वहीं दूसरी ओर यह तेजस्वी और तेजप्रताप के राजनीतिक पहल की शुरुआत भी है।