ये था अब्दुल कलाम की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट, महामहिम नहीं गरीबों के मसीहा थे मिसाइलमैन कलाम

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अब्दुल कलाम राजनीति से लेकर इंसानियत की दुनिया का एक ऐसा नाम है, जिसे शब्दों में बयां कर पाना बेहद मुश्किल है। अब्दुल कलाम का पूरा नाम अब्दुल पाकिर जैनुअल आब्दीन अब्दुल कलाम था। अपनी जिंदगी में अपने काम अपने मेहनत से जो कमाया उससे ज्यादा उन्होंने लोगों के दिल जीत कर कमाया था। बात भारत की हो या किसी दूसरे देश की अब्दुल कलाम का नाम आते ही अपने आप हर किसी का सर झुक जाता है। हर कोई अब्दुल कलाम को दिल से नमन करता है। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि कैसे एक आम से साधारण परिवार में जन्मे अब्दुल कलाम भारत के महामहिम यानी राष्ट्रपति बन गए। उनके जीवन का वह सफर टर्निंग प्वाइंट का वो किस्सा भी आपकों सूनायेंगे। साथ ही उनकी कुछ अनदेखी तस्वीरें भी आपको दिखाएंगे।

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अब्दुल कलाम पर लिखित किताब टर्निंग पॉइंट में उनकी जिंदगी में आए सबसे बड़े टर्निंग पॉइंट यानी उस फोन की घंटी का जिक्र किया गया है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह एक फोन की घंटी उनके लाइफ का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बन गई।

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किताब में अब्दुल कलाम ने बताया है कि रोज की तरह वह दिन भी बेहद सामान्य था। चेन्नई की अन्ना यूनिवर्सिटी के परिसर में संकल्पना के लक्ष्य तक विषय पर मेरा लेक्चर हुआ था जो कि 1 घंटे से बढ़कर 2 घंटे तक चला था। उसके बाद मैंने रिसर्च के छात्राओं के साथ भोजन किया और फिर क्लास में चला गया। शाम को जब मैं अपने कमरे में लौटा तो वाइस चांसलर प्रोफेसर कलानिधि भी मेरे साथ थे। उस दौरान उन्होंने मुझे बताया कि दिनभर से कोई मुझसे संपर्क करने की कोशिश कर रहा था।

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तभी दुबारा फोन बजने लगा मैंने कमरे में जाकर फोन उठाया दूसरी ओर से आवाज आई प्रधानमंत्री जी आपसे बात करना चाहते हैं। कुछ ही महीने पहले मैंने कैबिनेट स्तर का मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार का पद छोड़ा था, ताकि मैं अध्यापन के अपने काम की ओर लौट सकूं।

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दूसरी ओर से आवाज आई मैं आपका फोन प्रधानमंत्री के फोन से कनेक्ट कर रहा हूं। ये अवाज आंध्रप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की थी। मैं आगे कुछ कहता उससे पहले अटल बिहारी वाजपेई जी का फोन कनेक्ट हो गया। वाजपेई जी ने फोन पर कहा कि कलाम आपकी शैक्षणिक जिंदगी कैसी है? मैंने कहा बहुत अच्छी बाजपाई जी ने आगे कहा कि मेरे पास आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण खबर है।

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वाजपेई जी ने कहा मैं अभी गठबंधन के सभी नेताओं के साथ बैठ कर बात करके आया हूं और हम सब ने फैसला किया है कि देश को आपकी एक राष्ट्रपति के रूप में जरूरत है। मैंने आज रात इसकी घोषणा नहीं की है आप की सहमति चाहिए। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा कि मैं बस आपकी हां के सुनना चाहता हूं। मैंने उनसे सोचने के लिए दो घंटे का समय मांगा…

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2 घंटे में मैंने करीब 30 से ज्यादा दोस्तों को कॉल किया, जिनसे में से कई सिविल सर्विसेज में थे तो कुछ राजनीति से जुड़े थे। उन सब से बात करके दो राय सामने आई। एक राय थी कि मैं शैक्षणिक जीवन का आनंद ले रहा हूं यह मेरा जुनून और प्यार है। इससे मुझे कभी परेशानी नहीं होगी, वहीं दूसरी राय थी कि मेरे पास मौका है भारत 2020 मिशन को देश और संसद के सामने प्रस्तुत करने का…

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इसके बाद मैंने फिर सोचना शुरू किया ठीक 2 घंटे बाद मैंने वाजपेई जी को फोन किया और कहा मैं इस महत्वपूर्ण मिशन के लिए तैयार हूं। वाजपेई जी ने कहा धन्यवाद 15 मिनट के अंदर यह खबर पूरे देश में फैल गई। थोड़ी ही देर बाद मेरे पास फोन कॉल की बाढ़ आने लगी। मेरी सुरक्षा बढ़ा दी गई और मेरे कमरे में सैकड़ों लोग इकट्ठा हो गए।

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यह पहला मौका था जब वाजपेई जी के विपक्ष की नेता सोनिया गांधी से बात की जब सोनिया ने उनसे पूछा कि क्या एनडीए की पसंद फाइनल है। प्रधानमंत्री ने सकारात्मक तौर पर जवाब दिया सोनिया गांधी ने अपनी पार्टी के सदस्यों और सहयोगी दलों से बात कर मेरी उम्मीदवारी के लिए समर्थन दे दिया। मुझे अच्छा लगता अगर मुझे लेफ्ट का भी समर्थन मिलता, लेकिन उन्होंने अपना उम्मीदवार मनोनीत कर दिया था।

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ऐसे में मेरे नाम को राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के लिए मंजूरी के बाद मीडिया द्वारा मुझसे कई सवाल पूछे गए। इस दौरान कई लोगों ने पूछा कि गैर राजनीतिक व्यक्ति और खासकर वैज्ञानिक कैसे राष्ट्रपति बन सकता है? इसके जवाब में मुझे पहले कुछ समझ नहीं आया कि मैं क्या कहूं, लेकिन धीरे-धीरे मैंने इस पक्ष में जवाब दिया।

इसके बाद 25 जुलाई को एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति बने। कुल 2 प्रत्याशियों में कलाम को 9,22,884 वोट मिले थे। वहीं लेफ्ट समर्थित उम्मीदवार कैप्टन लक्ष्मी सहगल को 1,07,366 मत मिले थे। यह जीत अब्दुल कलाम ने ऐसे आंकड़ों के साथ दर्ज की थी जिसे आज तक राष्ट्रपति उम्मीदवारों की जीत में रिकॉर्ड माना जाता है।

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बता दें कि डॉ एपीजे अब्दुल कलाम भारत के पहले से राष्ट्रपति थे जिनका राजनीति से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। उनमें राजनीति के कोई गुण नहीं थे। वह राजनीति में आए अपनी शख्सियत से उन्होंने राजनीति में कदम रखा एक आम इंसान बनकर और यही कारण था कि उन्हें देश का महामहिम नहीं बल्कि गरीबों का महामहिम कहा जाता था।